भारत की जैव-अर्थव्यवस्था हेतु वर्ष 2035 का रोडमैप 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • हाल ही में नीति आयोग ने “वर्ष 2035 तक भारत को अग्रणी जैव-अर्थव्यवस्था महाशक्ति के रूप में विकसित करने हेतु रोडमैप” जारी किया है। यह रोडमैप वर्ष 2035 तक भारत को विश्व की शीर्ष तीन जैव-प्रौद्योगिकी शक्तियों में स्थापित करने के लिए एक विस्तृत रणनीति प्रस्तुत करता है।

रोडमैप की प्रमुख विशेषताएँ

  • भारत की महत्त्वाकांक्षी जैव-अर्थव्यवस्था संबंधी लक्ष्य: भारत की जैव-अर्थव्यवस्था का आकार वर्ष 2014 में 10 अरब अमेरिकी डॉलर तथा वर्ष 2025 में 195.3 अरब अमेरिकी डॉलर (राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 4.8%) से वृद्धि कर वर्ष 2035 तक 691 अरब अमेरिकी डॉलर तथा वर्ष 2047 तक 2.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
    • जैव-प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, कृषि, औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी तथा पर्यावरणीय क्षेत्रों में 3 करोड़ से अधिक उच्च-मूल्य रोजगार सृजित करने का लक्ष्य।
    • भारत को अनुसंधान-आधारित पारितंत्र, वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार तथा जैव-विनिर्माण के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करना।
  • ₹50,000 करोड़ का जैव-अर्थव्यवस्था विकास कोष (2026–2035): वर्ष 2026–2035 के लिए ₹50,000 करोड़ का जैव-अर्थव्यवस्था विकास कोष स्थापित करने का प्रस्ताव किया गया है।
    • इसका उद्देश्य जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में प्रयोगशाला अनुसंधान और वाणिज्यिक उत्पादन के बीच विद्यमान ‘विकास-अंतराल’ को समाप्त करना है।
    • यह कोष निम्नलिखित क्षेत्रों को सहायता प्रदान करेगा—
      • व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF)
      • साझा जैव-विनिर्माण अवसंरचना का विकास।
      • उन्नत उपचार , कृत्रिम जैविकी , किण्वन प्रौद्योगिकी , निदान  तथा जैव-विनिर्माण जैसे उभरते क्षेत्रों को प्रोत्साहन।
      • मिश्रित वित्त एवं इक्विटी-जोखिम साधनों में निवेश।
    • इसके अतिरिक्त, घरेलू जैव-विनिर्माण को प्रोत्साहित करने, आयात निर्भरता कम करने तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना की अनुशंसा की गई है।

छह राष्ट्रीय जैव मिशन 

  • रोडमैप में लक्षित एवं प्रभावी क्रियान्वयन हेतु छह मिशन मोड कार्यक्रमों की अनुशंसा की गई है—
    • जीनइंडिया: सस्ती जीन एवं कोशिका उपचार ।
      • परिशुद्ध चिकित्सा तथा जीनोमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विकास।
    • एग्रीबायो 2.0: जलवायु-अनुकूल जीन-संपादित फसलों का विकास।
      • जैव-उर्वरक एवं जैविक फसल संरक्षण को बढ़ावा।
    • बायोएक्स फाउंड्री: कृत्रिम जैविकी आधारित नवाचारों का वाणिज्यीकरण।
      • जैव-आधारित विनिर्माण मंचों का विकास।
    • वन हेल्थ ग्रिड: संक्रामक रोगों की एकीकृत निगरानी।
      • प्रतिजैविक प्रतिरोध (AMR) की निगरानी।
      • मानव, पशु एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य का समन्वित दृष्टिकोण।
    • समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी मिशन: समुद्री शैवाल की कृषि का विस्तार।
      • समुद्री जैव-उत्पादों तथा नीली जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा।
    • बायोफार्मानेक्स्ट: जैविक औषधियों एवं जैव-समान औषधियों के वैश्विक केंद्र के रूप में भारत का विकास।
      • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित औषधि खोज एवं वैक्सीन नवाचार को प्रोत्साहन।

संस्थागत एवं नियामकीय सुधार

  • रोडमैप में निम्नलिखित संस्थागत व्यवस्थाओं का प्रस्ताव किया गया है—
    • मंत्रालयों के मध्य समन्वय हेतु राष्ट्रीय जैव मिशनों की सशक्त समिति
    • जैविक एवं स्वास्थ्य संबंधी आँकड़ों के प्रबंधन हेतु राष्ट्रीय जैव-डेटा परिषद
    • सार्वजनिक एवं निजी निवेशों के समन्वय हेतु जैव-अर्थव्यवस्था निवेश एवं नीति मंच
    • जैव-प्रौद्योगिकी बौद्धिक संपदा के मूल्यांकन एवं वाणिज्यीकरण हेतु जैव-बौद्धिक संपदा एवं नवाचार मूल्यांकन एजेंसी
  • अन्य प्रमुख अनुशंसाएँ: जीन उपचार, कृत्रिम जैविकी आधारित उत्पादों तथा AI-आधारित औषधियों के लिए त्वरित स्वीकृति प्रक्रिया (Fast-Track Approval Pathway) विकसित करना।
    • केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) का आधुनिकीकरण।
    • राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन के अंतर्गत साझा विनिर्माण सुविधाओं एवं उच्च-प्रदर्शन संगणना (HPC) से युक्त पाँच एकीकृत जैव-नवाचार क्लस्टरों का विकास।

महत्त्व

  • यह रोडमैप जैव-प्रौद्योगिकी को डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तथा ऊर्जा अवसंरचना के समान एक रणनीतिक राष्ट्रीय अवसंरचना के रूप में मान्यता प्रदान करता है।
  • इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, संगणनात्मक जीवविज्ञान तथा स्वचालित जैव-निर्माण प्रणालियों के एकीकरण पर बल दिया गया है।
  • इन प्रौद्योगिकियों के अभिसरण से—
    • अनुसंधान अवधि में कमी आएगी।
    • विनिर्माण दक्षता में वृद्धि होगी।
    • स्वास्थ्य क्षेत्र की लचीलापन सुदृढ़ होगा।
    • सतत कृषि को बढ़ावा मिलेगा।
    • वैश्विक जैव-अर्थव्यवस्था में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता मजबूत होगी।
  • यह रोडमैप BioE3 नीति, आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया तथा भारत को वैश्विक नवाचार केंद्र बनाने की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप है।

चुनौतियाँ

  • जैव-प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स हेतु जोखिम पूँजी की सीमित उपलब्धता।
  • शैक्षणिक संस्थानों एवं उद्योग के मध्य समुचित समन्वय का अभाव।
  • नई प्रौद्योगिकियों की स्वीकृति में नियामकीय विलंब।
  • पर्याप्त जैव-विनिर्माण अवसंरचना का अभाव।
  • जैविक एवं स्वास्थ्य संबंधी आँकड़ों के प्रबंधन में विखंडित शासन व्यवस्था।
  • बहु-विषयक उच्च कौशलयुक्त मानव संसाधन की कमी।
  • जीनोम इंडिया परियोजना द्वारा समृद्ध जीनोमिक आँकड़े उपलब्ध कराए गए हैं, किंतु उन्हें नैदानिक अनुसंधान में उपयोगी बनाने हेतु बेहतर डेटा-साझाकरण व्यवस्था तथा परस्पर-संगत डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • रोडमैप की सफलता मिशन मोड में प्रभावी क्रियान्वयन, समन्वित शासन व्यवस्था तथा सतत सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर निर्भर करेगी। इसके लिए निम्नलिखित कदम प्राथमिकता के आधार पर उठाए जाने चाहिए—
    • जैव-अर्थव्यवस्था विकास कोष का शीघ्र परिचालन।
    • छह राष्ट्रीय जैव मिशनों का स्पष्ट एवं मापन योग्य लक्ष्यों के साथ कार्यान्वयन।
    • जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान एवं विकास तथा उसके वाणिज्यीकरण को सुदृढ़ करना।
    • जैव-नवाचार क्लस्टरों एवं साझा अवसंरचना का विस्तार।
    • उत्तरदायी डेटा शासन व्यवस्था विकसित करना तथा नियामकीय स्वीकृतियों में तेजी लाना।
    • वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी जैव-प्रौद्योगिकी कार्यबल का विकास।

निष्कर्ष

  • यदि इस रोडमैप का प्रभावी एवं समयबद्ध क्रियान्वयन किया जाता है, तो जैव-प्रौद्योगिकी भारत की आर्थिक वृद्धि, स्वास्थ्य सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जलवायु अनुकूलता तथा प्रौद्योगिकी नेतृत्व का एक प्रमुख आधार बन सकती है। साथ ही, यह विकसित भारत–2047 के लक्ष्य की प्राप्ति में भी महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करेगी।

स्रोत: TH

 

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